Saturday, January 31, 2026
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आज का शब्द: इन्दीवर और महादेवी वर्मा की कविता- पुलक पुलक उर, सिहर सिहर तन

                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- इन्दीवर, जिसका अर्थ है- नीलकमल, नीलोत्पल। प्रस्तुत है महादेवी वर्मा की कविता- पुलक पुलक उर, सिहर सिहर तन
                                                                 
                            

पुलक पुलक उर, सिहर सिहर तन,
आज नयन आते क्यों भर-भर!

सकुच सलज खिलती शेफाली,
अलस मौलश्री डाली डाली;
बुनते नव प्रवाल कुंजों में,
रजत श्याम तारों से जाली;
शिथिल मधु-पवन गिन-गिन मधु-कण,
हरसिंगार झरते हैं झर झर!
आज नयन आते क्यों भर भर?

पिक की मधुमय वंशी बोली,
नाच उठी अलिनी भोली;
अरुण सजल पाटल बरसाता
तम पर मृदु पराग की रोली;
मृदुल अंक धर, दर्पण सा सर,
आज रही निशि दृग-इन्दीवर!
आज नयन आते क्यों भर भर?

आँसू बन बन तारक आते,
सुमन हृदय में सेज बिछाते;
कम्पित वानीरों के बन भी,
रह हर करुण विहाग सुनाते,
निद्रा उन्मन, कर कर विचरण,
लौट रही सपने संचित कर!
आज नयन आते क्यों भर भर?

जीवन-जल-कण से निर्मित सा,
चाह-इन्द्रधनु से चित्रित सा,
सजल मेघ सा धूमिल है जग,
चिर नूतन सकरुण पुलकित सा;
तुम विद्युत बन, आओ पाहुन!
मेरी पलकों में पग धर धर!
आज नयन आते क्यों भर भर?

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एक दिन पहले

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