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बिहार की सियासत और सत्ता का महाविस्फोट: गरीब-गुरबा और माई की कमाई, जंगलराज-परिवारवाद ने गंवाई

साल 1990। यह दौर देश में मंडल और कमंडल की राजनीति का था। बिहार उस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा था। 1988 में पिछड़े वर्ग के रहनुमा कर्पूरी ठाकुर का निधन हो चुका था और 1989 में भागलपुर दंगा हुआ, जिसने मुस्लिम समुदाय को कांग्रेस से पूरी तरह विमुख कर दिया। इसी दौरान, देश में मंडल की राजनीति सरकारी फाइलों से निकल कर जमीन पर उतरने वाली थी और केंद्र से लेकर बिहार तक कांग्रेस का सफाया हो चुका था।

केंद्र में बोफोर्स घोटाले के हो-हल्ले में राजीव गांधी सरकार हार चुकी थी और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। लेकिन, बिहार में भी कांग्रेस विधानसभा चुनाव हार गई थी, और अब यहां भी मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इसे लेकर केंद्रीय नेतृत्व के तमाम गुट अपने-अपने मोहरे चल रहे थे। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव पहले ही मुख्यमंत्री बन चुके थे और अब बारी बिहार की थी। सदियों पुराने जातीय प्रभुत्व को ध्वस्त करने के लिए एक नए समीकरण की जरूरत थी और वह बनाया लालू प्रसाद यादव ने। यूं कहें कि कर्पूरी ठाकुर ने जो विरासत तैयार की, उसका लाभ उठाया लालू प्रसाद यादव ने।

मुख्यमंत्री की रेस : नीतीश की चाल से मिली लालू को सत्ता

1990 के विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। बिहार विधानसभा की 324 सीटों में कांग्रेस सिर्फ 71 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि जनता दल ने 122 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जनता दल सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन मुख्यमंत्री कौन होगा, इसे लेकर घमासान शुरू हो गया। शुरुआत में, पूर्व मुख्यमंत्री राम सुंदर दास का नाम सबसे आगे था। वह तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की पसंद थे। इसी बीच, लालू का चेहरा तेजी से रेस में आया। उन्हें तत्कालीन उप प्रधानमंत्री देवीलाल का समर्थन हासिल था। तत्कालीन सहयोगी नीतीश कुमार भी उनके साथ थे, लेकिन वीपी सिंह की इच्छा के चलते रामसुंदर दास आगे थे। उनकी छवि भी साफ-सुथरी थी। बताते हैं कि तब नीतीश कुमार ने ही दोस्त लालू का साथ दिया।

हुआ यह था कि केंद्र में वीपी सिंह प्रधानमंत्री भले ही बन गए थे, लेकिन 1989 में पीएम पद को लेकर बलिया से सांसद चंद्रशेखर से उनका छत्तीस का आंकड़ा था। ऐसे में दोनों गुटों ने अपनी अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाने का दांव चलना शुरु कर दिया। तब बिहार में पिछड़ा राजनीति को मजबूत बनाने के अभियान में नीतीश भी दमदार चेहरा बन चुके थे। नीतीश कुमार और लालू प्रसाद दोनों ही जयप्रकाश नारायण के शिष्य थे और 1989-90 के दौर में दोनों ने मिलकर बिहार में जनता दल की मजबूती और फिर उसकी जीत में अहम भूमिका निभाई थी।

  • इस दोस्ती का ही असर था कि नीतीश ने चंद्रशेखर से बात की और उस रणनीति का असर ये हुआ कि एक और चेहरे रघुनाथ झा की एंट्री करा दी गई। उससे वोट विभाजित हुए, और लालू प्रसाद सिर्फ तीन वोट के मामूली अंतर (59 बनाम 56) से विधायक दल के नेता चुने गए। 10 मार्च 1990 को, लालू प्रसाद बिहार के सबसे ताकतवर पिछड़ा वर्ग के मुख्यमंत्री बनकर उभरे।

एमवाई : मास्टरस्ट्रोक और सामाजिक विभाजन

लालू प्रसाद ने तुरंत ही एमवाई (मुस्लिम-यादव) गठजोड़ को मज़बूत किया। अपनी चुटीली वक्तृत्व शैली और एक अलग परिवेश धारण कर वह सबकी निगाहों में बने रहे। समर्थक उनके मुरीद थे तो विरोधी भी लालू की सियासत और हाव-भाव की काट नहीं ढूढ़ पाते थे। इन सबके बीच यूपी के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की तरह ही सेकुलिरज्म के सूरमा बनने के लिए उन्होंने अपनी ही जनता दल की सरकार तक गिरवा दी। अयोध्या में राम मंदिर के समर्थन में रथ यात्रा निकाल रहे तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को रोका और गिरफ्तार करवा लिया। इस घटनाक्रम ने उन्हें मुस्लिम समुदाय का निर्विवाद नेता बना दिया।

  • केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिरने के बावजूद, लालू ने बीजेपी के 13 विधायकों को तोड़कर और लेफ्ट तथा दूसरे दलों के समर्थन से अपनी सरकार बचा ली और पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। लालू ने अगड़ी जातियों के प्रभुत्व को सीधे चुनौती देने के लिए कई प्रतीकों का इस्तेमाल किया। इसी क्रम में एक सियासी नारा सामने आया-भूरा बाल साफ करो। इसका मतलब था कि (भू-भूमिहार, रा-राजपूत, बा-ब्राह्मण, ल-लाला/कायस्थ को मिटा दो। इस समाज तोड़ने वाले नारे ने लालू के नेतृत्व में पिछड़ी जातियों को लामबंद किया, लेकिन सामाजिक विभाजन के खतरनाक बीज बो दिए। इस लिहाज से लालू का शासन जातीय ध्रुवीकरण का पर्याय बन गया।
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