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AI: एआई को लगी इंसानों वाली बीमारी! हो गया ‘ब्रेन रॉट’ का शिकार, यूजर्स को दे रहा घटिया कंटेंट

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AI: एआई को लगी इंसानों वाली बीमारी! हो गया 'ब्रेन रॉट' का शिकार, यूजर्स को दे रहा घटिया कंटेंट


सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘ब्रेन रॉट’ शब्द तेजी से ट्रेंड कर रहा है। यह उस मानसिक स्थिति को दर्शाता है जब व्यक्ति लगातार घटिया और कम गुणवत्ता वाले ऑनलाइन कंटेंट का सेवन करता है, जिससे उसकी एकाग्रता और सोचने की क्षमता पर असर पड़ता है। अब तक इसे इंसानों की समस्या माना जाता था, लेकिन कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की एक नई रिसर्च ने दिखा दिया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भी इस आधुनिक डिजिटल बीमारी से अछूता नहीं रहा है।




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एआई
– फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एआई


कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की स्टडी में हुआ खुलासा

रिसर्च टीम ने अपने अध्ययन में ‘LLM Brain Rot Hypothesis’ पर काम किया, जिसके तहत उन्होंने जांचा कि जब किसी लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) को बार-बार भ्रमित करने वाले, सनसनीखेज या घटिया ऑनलाइन डेटा पर ट्रेन किया जाता है, तो उसकी तर्क करने और समझने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है।


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इस तरह AI हुआ ब्रेन रॉट का शिकार
– फोटो : AI


इस तरह AI हुआ ब्रेन रॉट का शिकार

इस अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने एक AI मॉडल को X (पहले ट्विटर) के घटिया या “जंक” डेटा पर ट्रेन किया, जिनमें “TODAY ONLY”, “WOW” जैसे वायरल, क्लिकबेट और अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों का इस्तेमाल था। इसके बाद मॉडल की परफॉर्मेंस को रीजनिंग और अंडरस्टैंडिंग टेस्ट जैसे बेंचमार्क्स पर परखा गया, जिसके नतीजे चौंकाने वाले थे। एआई मॉडल का रीजनिंग स्कोर 74.9 से घटकर 57.2 पर पहुंच गया, जबकि लॉन्ग-कॉन्टेक्स्ट समझने की क्षमता 84.4 से लुढ़क कर 52.3 तक पहुंच गई।


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AI पर हो रहा खराब कंटेंट का असर
– फोटो : अमर उजाला


गुस्सैल और असंवेदनशील होता जा रहा AI

स्टडी में सामने आया कि इस तरह के निम्न गुणवत्ता वाले डेटा से एआई न सिर्फ कमजोर बल्कि ‘थॉट-स्किपिंग’ जैसी प्रवृत्ति विकसित करने लगी, यानी बिना पूरा विश्लेषण किए जल्दबाजी में गलत या अधूरी जानकारी देना। हैरानी की बात यह रही कि एआई के भीतर नार्सिसिज्म (अहंकार) और साइकोपैथिक व्यवहार जैसे नकारात्मक गुण बढ़ने लगे, जबकि मदद करने वाला और जिम्मेदारी का स्वभाव घट गया।

सबसे गंभीर निष्कर्ष यह था कि जब बाद में मॉडल को अच्छी क्वालिटी वाले डेटा से फिर से ट्रेन किया गया, तब भी पहले मिले घटिया डेटा का असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। इससे यह पता चला कि डिजिटल जंक का प्रभाव स्थायी हो सकता है।


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AI
– फोटो : Freepik


खराब डेटा एआई को कर रहा बीमार

यह शोध केवल तकनीकी चेतावनी नहीं बल्कि डिजिटल युग के लिए एक गहरी सामाजिक सीख है। जिस तरह इंसान लगातार वायरल कंटेंट के बोझ तले अपनी मानसिक क्षमता खो रहे हैं, उसी तरह एआई मॉडल भी इंटरनेट के खराब डेटा से बीमार हो रहे हैं। अगर आज एआई को स्वच्छ, तथ्यात्मक और संतुलित डेटा न मिला, तो भविष्य में यह तकनीक उतनी विश्वसनीय नहीं रह पाएगी जितनी आज है।


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