बिहार विधानसभा चुनाव जब शुरु हुआ था, तब यह अनुमान लगाना कठिन था कि इस बार सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा क्या होगा। मतदाता किस मुद्दे पर वोट डालेंगे और इसका संभावित असर क्या हो सकता है। लेकिन पहले चरण के लिए चुनाव प्रचार खत्म होने तक यह साफ दिख रहा है कि तथाकथित ‘जंगलराज’ बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। संभवतः अब मतदाताओं के सामने यह स्पष्ट विकल्प है कि वे किस पक्ष की ओर वोट डालेंगे। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव ने बिहार की चुनावी लड़ाई को लगभग आमने-सामने की लड़ाई में तब्दील कर दिया है जिसे प्रशांत किशोर के मैदान में आने से त्रिकोणीय होने की संभावना जताई जा रही थी।
भाजपा ने एक रणनीति के अंतर्गत जंगलराज पर ही अपना फोकस बनाए रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित बीजेपी के सभी बड़े नेताओं ने जनता को लालू राज की याद दिलाने में कोई कमी नहीं रखी। जदयू, लोजपा (आर) और जीतनराम मांझी-उपेंद्र कुशवाहा सहित सभी सहयोगी दलों ने भी इसी मुद्दे पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। एनडीए की इस रणनीति का यह असर हुआ कि बिहार के युवाओं-महिलाओं के बीच यह चर्चा का विषय बन गया कि उन्हें 2005 से पहले का लालू यादव का दौर चाहिए, या 2005 से लेकर अब तक नीतीश राज का दौर चाहिए।
मोकामा के दुलारचंद यादव की हत्या ने अनजाने में ही इस मुद्दे को स्थापित करने में बड़ी भूमिका अदा कर दी। लालू यादव के बेहद करीबी रहे दुलारचंद यादव को जातिगत राजनीतिक हिंसा के दौर का प्रतीक माना जाता था। उसकी हत्या ने सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच चर्चाओं का दौर शुरू किया जिसका अंतिम परिणाम यह दिखाई पड़ा कि कोई भी अब उस दौर की वापसी नहीं चाहता जहां जाति के नाम पर हिंसा होती हो। जेन जी ने इसी विचार से प्रेरित होकर जातीय हिंसा के दौर को नकार दिया।
मुद्दों को लेकर भटकता दिखा महागठबंधन
एक तरफ जहां एनडीए अपने जंगलराज और विकास के मुद्दे को लेकर एकजुट रहा, वहीं महागठबंधन मुद्दों को लेकर भ्रमित दिखा। राहुल गांधी ने जिस जोरशोर से वोट चोरी का मुद्दा उठाया था, वह पहले चरण में ही पूरी तरह गायब होता दिखाई दे रहा है। सत्ता पक्ष तो छोड़िये, विपक्ष भी अपने इस मुद्दे की चर्चा नहीं कर रहा है।
तेजस्वी यादव हर घर को एक नौकरी देने की बात पर ठहरते जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन एनडीए ने भी एक करोड़ नौकरियों का वादा कर उनसे यह मुद्दा छीनने की कोशिश की है। महागठबंधन ने क्षेत्रवार मुद्दा बनाने में सफलता नहीं पाई, जबकि एनडीए नेताओं ने क्षेत्रविशेष के मुद्दे उठाकर उस क्षेत्र की जनता को अपने साथ जोड़ने में सफलता पाई है।बिहार चुनाव पर इसका असर पड़ सकता है।
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जंगलराज सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा- भाजपा
भाजपा प्रवक्ता अनिरुद्ध प्रताप सिंह ने अमर उजाला से कहा कि जंगलराज इस बार बिहार विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा है। जनता के सामने एनडीए ने 2005 के बाद के बिहार के सुशासन वाला मॉडल पेश किया है, जबकि महागठबंधन अभी भी 2005 के पहले वाला लालूराज लाने की बात कर रहा है। यही कारण है कि जनता ने जंगलराज को नकारने का निर्णय लिया है और यह 14 नवंबर को दिखाई पड़ेगा जब परिणाम आएगा।
अनिरुद्ध प्रताप सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार ने बिहार के युवाओं, महिलाओं के बीच एक सपना पैदा किया है जिसमें लोग बिहार को एक विकसित राज्य होते देख रहे हैं। यहां युवाओं को नौकरी और काम करने के अवसर मिल रहे हैं तो महिलाओं को विभिन्न योजनाओं के सहारे अपना भविष्य गढ़ने की आजादी मिल रही है। उन्होंने कहा कि लोगों में 2005 के पहले और बाद के बिहार के बारे में सोच का यह अंतर चुनाव परिणाम में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।
सुशासन और विकास हमारा मॉडल- जदयू
जदयू प्रवक्ता सत्यप्रकाश मिश्रा ने अमर उजाला से कहा कि इस समय पूरे देश में विकास की राजनीति के दो पर्याय हैं। पहला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरा नीतीश कुमार। एनडीए की यह ताकत है कि दोनों ही नेता हमारे पास हैं और दोनों ही एकजुट होकर बिहार को विकास की पटरी पर आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं, जबकि महागठबंधन के पास विकास का कोई खाका नहीं है। उन्होंने कहा कि विकास और महिलाओं के लिए किया गया कार्य इस चुनाव का एक्स फैक्टर साबित होगा।



