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Vande Mataram: आजादी के आंदोलन में क्या है बारीसाल का महत्व? जहां वंदे मातरम बन गया विद्रोह की आवाज

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Vande Mataram: आजादी के आंदोलन में क्या है बारीसाल का महत्व? जहां वंदे मातरम बन गया विद्रोह की आवाज

संसद में आज वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के मौके पर भारत के राष्ट्रीय गीत और इससे जुड़े इतिहास पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में चर्चा की शुरुआत करते हुए बलिदानी सपूतों को याद किया। उन्होंने वंदे मातरम के इतिहास और आजादी के आंदोलन में इसके योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि अंग्रेजों के शासनकाल में गुलामी की बेड़ियों में जकड़े देश को झकझोरने के लिए बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने वंदे मातरम जैसे गीत की रचना की। इस दौरान पीएम ने राष्ट्रगीत की रचना से लेकर इससे जुड़ी कई ऐतिहासिक घटनाओं को याद किया। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का जिक्र किया और आरोप लगाया कि कांग्रेस ने वंदे मातरम पर समझौता कर लिया और मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिए।

गौरतलब है कि पीएम मोदी पहले भी वंदे मातरम से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को याद करते रहे हैं। वंदे मातरम की रचना की 150वीं वर्षगांठ पर भीप्रधानमंत्री ने वंदे मातरम से गीत से जुड़ी उनघटनाओं के बारे में बताया था, जिन्होंने राष्ट्र को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। इनमें एक जिक्रबारीसाल का भी था, जहां एक समय वंदे मातरम का झंडा लेकर हजारों लोग जुट गए थे। इनमें हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम भी बड़ी संख्या में जुटे थे।

आइए जानते है आजादी के आंदोलन में बारीसाल का क्या महत्व रहा है।वंदे मातरम की रचना को राष्ट्रवादी चिंतन में मील का पत्थर माना जाता है, जो मातृभूमि के प्रति भक्ति और आध्यात्मिक आदर्शवाद के मेल का प्रतीक है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी लेखनी के ज़रिए, न केवल बंगाली साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारत के शुरुआती राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए बुनियादी वैचारिक सिद्धांत भी रखे। वंदे मातरम में उन्होंने देश को मातृभूमि को मां के रूप में देखने का नजरिया दिया।

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